शनिवार 29 नवंबर 2025 - 22:14
शहीदों की वसीयतों से बे तवज्जोही शहीदो के खून से खयानत है

हौज़ा / आयतुल्लाह नूरी हमदानी ने ईरान के मरकज़ी प्रांत में आयोजित 892 बासिज शहीदों की स्मारक सभा के लिए जारी अपने संदेश में स्पष्ट किया कि जो भी व्यक्ति किसी भी पद या स्थान पर हो और शहीदों की वसीयतनामों की ओर ध्यान न दे वह शहीदों के खून से खियानत करता है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , आयतुल्लाहिल उज़मा नूरी हमदानी का मरकज़ी प्रांत के 892 बासिज शहीदों की स्मारक सभा के लिए जारी संदेश का पाठ इस प्रकार है:

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیم

الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِینَ وَ الصَّلَاةُ وَ السَّلَامُ عَلَی سَیِّدِنا وَ نَبِیِّنَا أَبِی ‌الْقَاسِمِ المصطفی مُحَمَّد وَ عَلَی أهلِ بَیتِهِ الطَّیِّبِینَ الطَّاهِرِینَ سیَّما بَقیَّهَ اللهِ فِی الأرَضینَ و لعنة الله علی أعدائهم أجمعین إلی یوم الدین.

मैं इस सम्मानजनक सभा को सलाम और अभिवादन पेश करता हूं।

शहीदों की यादों और घटनाओं को जीवित रखना इत्माम और शहादत की संस्कृति को पुनर्जीवित करने के सबसे महत्वपूर्ण तरीकों में से एक है।

कुरआन करीम में बहुत कम वर्गों की इतनी प्रशंसा की गई है जितनी अल्लाह के रास्ते में जान देने वालों की:
وَلَا تَحْسَبَنَّ الَّذِینَ قُتِلُوا فِی سَبِیلِ اللّٰہِ أَمْوَاتًا بَلْ أَحْیَاءٌ عِنْدَ رَبِّهِمْ یُرْزَقُونَ» (آل عمران ۱۶۹)

और तुम हरगिज़ उन लोगों को मत समझो जो अल्लाह के रास्ते में मारे गए मुर्दा हैं, बल्कि वह जिंदा हैं और अपने पालनहार के पास रोज़ी पा रहे हैं।(आले-इमरान: 169)

और दूसरी आयत में शहीदों के लिए जन्नत का वादा स्पष्ट रूप से मौजूद है। हकीकत यह है कि शुरुआत से आज तक इस्लाम की हिफाजत इन्हीं शहीदों के खून से हुई है।

आज भी साम्राज्यवाद और सियोनिज़्म (जायोनिज़म) इस रूह और इस संस्कृति से पहले से ज्यादा डरे हुए हैं, इसीलिए जरूरी है कि आम लोगों को इस कुरआनी संस्कृति से परिचित कराया जाए
فَوْقَ کُلِّ ذِی بِرٍّ بَرٌّ حَتَّی یُقْتَلَ اَلرَّجُلُ فِی سَبِیلِ اَللَّهِ فَإِذَا قُتِلَ فِی سَبِیلِ اَللَّهِ فَلَیْسَ فَوْقَهُ بِرٌّ وَ إِنَّ فَوْقَ کُلِّ عُقُوقٍ عُقُوقاً حَتَّی یَقْتُلَ اَلرَّجُلُ أَحَدَ وَالِدَیْهِ فَإِذَا فَعَلَ ذَلِکَ فَلَیْسَ فَوْقَهُ عُقُوقٌ»

और यह भी समझाया जाए कि हमारी रिवायतों के अनुसार हर इबादत की एक ऊंची मंजिल है मगर शहादत की ऊंचाई से ऊपर कोई दर्जा नहीं है।

लेकिन सवाल यह है कि यह संस्कृति कैसे सुरक्षित रहे? इसके सुरक्षित रहने का एक महत्वपूर्ण तरीका यह है कि शहीदों के लक्ष्यों, विचारधाराओं और वसीयतों का अध्ययन करके उन पर अमल किया जाए।

इमाम खुमैनी र.अ.ने भी फरमाया है कि सालों साल इबादत की हो अल्लाह कबूल करे लेकिन कुछ वक्त शहीदों के वसीयतनामों के लिए भी निकालें।

हकीकत यह है कि जब इंसान इन वसीयतनामों का अध्ययन करता है तो देखता है कि यह पाकीज़ा हस्तियां कम उम्र में ही ऐसे मआरिफ बयान करती हैं जिन तक पहुंचने के लिए सालों साल हौज़ा और यूनिवर्सिटी में तालीम की जरूरत है।

एक शहीद अपने वसीयतनामे में लिखता है,मुझे नाकाम मत करना, मेरी कामयाबी अल्लाह तक पहुंचना है।

एक और शहीद अपने वालिदैन और अजीजों को वसीयत करता है,मेरी शहादत पर गिरिया मत करना कि कहीं इससे दुश्मन के दिल खुश न हो जाएं।

अक्सर वसीयतनामों में शहीदान-ए-इस्लाम के तहफ्फुज पर जोर देते हैं विलायत-ए-फकीह की पैरवी, आवाम और वतन की दिफा, और इंसाफ के कायम करने पर ताकीद करते हैं।

आज सभी वर्ग खासकर जिम्मेदारान (अधिकारी) इन वसीयतनामों के मुखातिब (संबोधित) हैं। आज का जिम्मेदार रात को सोने से पहले खुद से पूछे कि जो दिन गुजरा उसमें उसने ऐसा क्या किया कि शहीदों के खून के सामने शर्मिंदा न हो।

आज हमें यह जान लेना चाहिए कि शहीदों ने इस्लाम की दिफा में जान दी। जिम्मेदारान किस हद तक इस्लामी अकदार के पाबंद हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि बहानों के सहारे अकदार से गफलत हो रही हो?

मैंने सैकड़ों वसीयतनामों में देखा कि शहीदों ने हिजाब के तहफ्फुज पर बहुत ताकीद की है और सबको इस वाजिब-ए-इलाही की रिआयत (पालन) की वसीयत की है। अब हममें से हर एक का फर्ज है कि इन वसीयतों को बयान करे और उन पर अमल करे।

शहीदों ने विलायत-ए-फकीह की अमली पैरवी पर जोर दिया है न कि सिर्फ जुबानी।

शहीदों ने वहदत, हमदिली, आवाम की इज्जत, बा-इकतिबार जिंदगी, आसाइश और अम्न पर ताकीद की है।शहीदों ने शत्रु की पहचान और इस्तेकबार से मुकाबले की वसीयत की है।

और आखिर में शहीद इस्लाम और मुसलमानों की इज्जत के ख्वाहिशमंद थे।

लिहाजा कोई भी शख्स अगर किसी भी मकाम पर हो और इन वसीयतों से गफलत बरते तो वह शहीदों के खून से खियानत का मुरतकिब (अपराधी) होता है।

आखिर में मैं सभी शहीदों, जांबाज़ों बासिजियों और उनके मुहतरम परिवारों को खिराज-ए-तहसीन पेश करता हूं और इस यादगार तकरीब के मुनतजिमीन का शुक्रिया अदा करते हुए अल्लाह तआला से सबके लिए तौफिकात-ए-खैर की दुआ करता हूं।

हुसैन नूरी हमदानी

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